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नक्षत्रग्रहताराणामधिपो विश्वभावन: - भगवान सूर्य की उपासना का पर्व छठ

सौर मण्डल के स्वामी भगवान सूर्य की स्तुति अनेक रूपों में की जाती है।

उपरोक्त विशेषण भी श्री आदित्य हृदय स्तोत्र से लिए गए हैं - वे समस्त नक्षत्रों, ग्रहों और तराओं के स्वामी और विश्व की रक्षा/ पालन करने वाले हैं।

छठ पर्व सूर्य की राशिगत स्थिति को देखकर नहीं मनाया जाता है वरन यह तो तिथि आधारित है।

परन्तु प्रायः इन दिनों सूर्य नीचस्थ या अपनी नीच स्थिति (तुला राशि) के निकट ही होते हैं।


इस प्रकार यह पर्व कुछ विषम परिस्थितियों में पड़े सूर्य देव के पूजन का है।

अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देना पुनः इसी हेतु प्रतीत होता है।

एक विपरीत परिस्थिति गत सामर्थ्यशाली राजा भी अपने गुणों के कारण पूज्यनीय होता है और उसका पदच्युत होना या पदासीन होना मात्र इसका कारण नहीं हो सकता।


उदेति सविता ताम्र: ताम्र: एवस्तमेति च।

संपत्तौ च विपत्तौ च महतामेकरूपता ॥

उदय होते और अस्त होते समय सूर्य ताम्रवर्ण ही होता है। उद्भव और पराभव में महान लोग एकरूप ही रहते हैं।


भला सूर्य देव से बढ़कर यह शिक्षा कौन दे सकता है - वे प्रतिदिन हमें अपने उदाहरण से यही बताते हैं।


छठ पर्व सूर्य के एक अन्य अति विशिष्ट गुण का पूजन भी है। यह है उनका समदृष्टा रूप।

वे लोक साक्षी भी हैं, हमारा कोई भी कृत्य उनसे छिपा नहीं है।

सूर्य की ऊष्मा प्रत्येक प्राणी, जीव और वनस्पति के लिए समान है, बिना किसी भेदभाव के।

उनके इस रूप की पूजा ने इस पर्व को जन साधारण का पर्व बना दिया है।


भगवान भुवनभास्कर को नमन 🙏










 
 

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